सृष्टि के प्रारंभ न अंधकार था, न समय था, न दिशा और न ही कोई जीव। उस शून्य अवस्था में केवल परम ब्रह्म विद्यमान था।अनादि, अनन्त और निर्विकार परमात्मा ब्रह्म से ही सम्पूर्ण सृष्टि का उद्भव हुआ। सृष्टि की रचना का विचार उत्पन्न होते ही ब्रह्म में एक सूक्ष्म स्पन्दन जागृत हुआ, जिसे आदिशक्ति (शिवा/पराशक्ति) कहा गया। आदिशक्ति (जिन्होंने बाद में सती और फिर पार्वती के रूप में अवतार लिया)।
- शिव = परम चेतना (Consciousness)
- शिवा = परम शक्ति (Energy)
दोनों को अलग नहीं माना जाता। प्रसिद्ध वाक्य है:
"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।" अर्थात शक्ति के बिना शिव कोई कार्य नहीं कर सकते। शिव और शक्ति को अविभाज्य माना गया है—शिव बिना शक्ति के निष्क्रिय हैं और शक्ति बिना शिव के अपूर्ण।
परब्रह्म सदाशिव ने अपनी इच्छा से भगवान विष्णु को प्रकट किया और उन्हें सृष्टि के पालन का दायित्व सौंपा। विष्णु ने दीर्घकाल तक तप किया। तप के पश्चात विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। यह कमल सृष्टि के विस्तार और सृजन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कमल के पुष्प पर ब्रह्मा प्रकट हुए और ब्रह्मा के चार मुखों से चारों वेद प्रकट हुए।जिनसे समस्त ज्ञान का उदय माना गया। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पंचमहाभूतों पर आधारित भौतिक सृष्टि की रचना की।
इस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि निराकार, निर्विकार और अव्यक्त परम सत्ता में जब सृजन की इच्छा जागृत हुई, तब उससे सृष्टि के विकास की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। उपनिषदों में वर्णित “एकोऽहम् बहुस्याम्” अर्थात् “मैं एक से अनेक हो जाऊँ” का भाव इसी सृजनात्मक इच्छा का प्रतीक माना जाता है। यह उसकी इच्छा स्फुरणा नाभि देश में से निकल कर स्फुटित हुई अर्थात कमल की लतिका उत्पन्न हुई और उसकी कली खिल गयी। इस कमल पुष्प पर ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं।
कमल पर प्रकट हुए ब्रह्मा सृष्टि-निर्माण की शक्ति के प्रतीक हैं। आगे चलकर यही शक्ति उत्पत्ति, पालन और संहार के रूप में कार्य करती हुई ब्रह्मा, विष्णु और महेश अर्थात शिव के रूप में व्यक्त होती है। सृष्टि के आरम्भ में केवल ब्रह्मा का प्रकट होना इस तथ्य को दर्शाता है कि सर्वप्रथम सृजन की आवश्यकता थी।
ब्रह्मा ने सृष्टि में दो प्रकार के तत्वों का विस्तार किया — चेतन और जड़। चेतन तत्व में समस्त जीवधारी सम्मिलित हैं, जिनमें इच्छा, अनुभूति, चेतना और आत्मबोध पाया जाता है। आत्मा प्रत्येक जीव में चेतना का मूल आधार मानी जाती है। प्राण इसी चेतना को शरीर में जीवन और ऊर्जा प्रदान करने वाली शक्ति है। विचार, संकल्प और भाव चेतना की प्रमुख अभिव्यक्तियाँ हैं। जड़ तत्व प्रकृति से संबंधित है, जो भौतिक जगत की रचना का आधार बनता है। सत्त्व, रज और तम प्रकृति के तीन गुण माने गए हैं, जिनके प्रभाव से जीवों के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की संरचना तथा उनके स्वभाव का विकास होता है। सभी प्राणी आत्मा और प्राण के माध्यम से जीवन और चेतना का अनुभव करते हैं।
जड़ सृष्टि के निर्माण के लिए ब्रह्मा ने पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—का विस्तार किया। इन्हीं तत्वों से सम्पूर्ण भौतिक जगत का निर्माण हुआ। पर्वत, नदियाँ, समुद्र, वनस्पतियाँ तथा समस्त दृश्य संसार इन्हीं पंचतत्त्वों के विभिन्न संयोजनों से बना है। मानव का स्थूल शरीर भी इन्हीं पंचमहाभूतों से निर्मित माना जाता है।
सृष्टि की प्रत्येक क्रिया में जड़ और चेतन दोनों का योगदान माना गया है। चेतन तत्व में विचार, संकल्प और अनुभूति के रूप में गतिविधियाँ दिखाई देती हैं, जबकि जड़ प्रकृति में शक्ति, गति और संरचना के रूप में।
जड़ सृष्टि का आधार सूक्ष्म भौतिक तत्व हैं और चेतन सृष्टि का आधार आत्मा या चैतन्य है। ये दोनों तत्व सृष्टि की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पौराणिक परंपरा के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ में ज्ञान का प्राकट्य हुआ, जिसे वेदों की उत्पत्ति के रूप में व्यक्त किया गया है।
सृष्टि के संचालन हेतु इस शक्ति ने स्वयं को तीन गुणों में अभिव्यक्त किया—सत्त्व, रज और तम। सत्त्व को सरस्वती अथवा “ह्रीं” का स्वरूप माना गया, जो ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है। रज को लक्ष्मी अथवा “श्रीं” का स्वरूप माना गया, जो कर्म, गति और समृद्धि का प्रतिनिधित्व करता है। तम को काली अथवा “क्लीं” का स्वरूप माना गया, जो शक्ति, परिवर्तन और गहनता का प्रतीक है। यही तीनों गुण मिलकर सम्पूर्ण प्रकृति और सृष्टि का आधार बनते हैं। संसार की प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक जीव में ये तीनों गुण अलग-अलग मात्रा में विद्यमान रहते हैं और उनके स्वभाव, कर्म तथा विकास को प्रभावित करते हैं।
इस प्रकार भारतीय दर्शन सृष्टि को केवल भौतिक जगत का निर्माण नहीं मानता, बल्कि उसे चेतना, शक्ति और परम सत्य की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में देखता है। यही सृष्टि का सनातन रहस्य है।
भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि स्थिर नहीं है। इसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। जन्म, विकास और विनाश—ये प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। ब्रह्मा सृष्टि के निर्माता हैं, विष्णु पालनकर्ता हैं और महेश अर्थात शिव संहारकर्ता हैं। यही त्रिदेव सृष्टि के संतुलन को बनाए रखते हैं। यदि निर्माण हो और विनाश न हो, तो संसार असंतुलित हो जाएगा। इसी प्रकार यदि केवल विनाश हो और निर्माण न हो, तो जीवन समाप्त हो जाएगा। इसलिए सृष्टि का संचालन संतुलन के आधार पर होता है।
संकल्प शक्ति को सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। बिना संकल्प के कोई भी कार्य संभव नहीं। पहले विचार उत्पन्न होता है, फिर वह कार्य का रूप लेता है। इसी प्रकार ब्रह्मा ने पहले ज्ञान और चेतना का निर्माण किया, उसके बाद भौतिक सृष्टि की रचना की। पौराणिक भाषा में इसे “वेदों का प्राकट्य” कहा गया। वेद ज्ञान के प्रतीक हैं और ज्ञान के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं।
आधुनिक भौतिकी के अनुसार पदार्थ और ऊर्जा परस्पर रूपांतरित हो सकते हैं तथा ब्रह्माण्ड में ऊर्जा की मूलभूत भूमिका है। भारतीय दर्शन हजारों वर्ष पहले ही यह कह चुका था कि सम्पूर्ण सृष्टि ऊर्जा और चेतना का खेल है। विज्ञान जहाँ पदार्थ की खोज करता है, वहीं अध्यात्म चेतना की खोज करता है। दोनों का उद्देश्य सत्य तक पहुँचना है।
सृष्टि का रहस्य केवल बाहरी जगत को समझने में नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने में भी छिपा है। मनुष्य जब अपने भीतर की चेतना को पहचानता है, तब वह समझ पाता है कि वही शक्ति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। उपनिषदों में कहा गया है—“अहं ब्रह्मास्मि” अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मानव स्वयं ईश्वर बन जाता है, बल्कि यह कि उसके भीतर भी वही दिव्य चेतना विद्यमान है।
सृष्टि का अध्ययन हमें यह शिक्षा देता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु परस्पर जुड़ी हुई है। प्रकृति, जीव और ब्रह्माण्ड एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जब मानव प्रकृति का सम्मान करता है, तब वह सृष्टि के नियमों के अनुरूप जीवन जीता है। लेकिन जब वह प्रकृति का शोषण करता है, तब असंतुलन उत्पन्न होता है।भारतीय संस्कृति में सृष्टि को माता के समान माना गया है। पृथ्वी को “भूमाता” कहा गया, नदियों को देवी माना गया और वृक्षों की पूजा की गई। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक भावना नहीं था, बल्कि यह समझाना था कि प्रकृति ही जीवन का आधार है।
अंततः सृष्टि का रहस्य केवल शब्दों में नहीं समझा जा सकता। यह अनुभव का विषय है। ध्यान योग और साधना के माध्यम से मनुष्य उस परम चेतना का अनुभव कर सकता है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। यही भारतीय दर्शन का मूल संदेश है कि सृष्टि को जानने का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर है। इस प्रकार सृष्टि केवल भौतिक निर्माण नहीं, बल्कि चेतना, ऊर्जा और परम सत्य की अनंत यात्रा है। ब्रह्म से उत्पन्न होकर वही सृष्टि विविध रूपों में प्रकट होती है और अंततः उसी ब्रह्म में विलीन हो जाती है। यही सृष्टि का सनातन और शाश्वत रहस्य है।


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