योग Yoga


योग शब्द संस्कृत के "युज्" धातु से बना है, जिसमें "धञ्" प्रत्यय लगने से इसका निर्माण हुआ है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार, "युज्" धातु तीन प्रमुख गणों में पायी जाती है:
पीपल के वृक्ष के नीचे भगवा वस्त्र पहने योगी का ध्यान मुद्रा

  • युज् समाधौ (दिवादि गण, आत्मनेपदी) - जिसका अर्थ है समाधि या ध्यानस्थ अवस्था।
  • युजिर योगे (रुधादि गण, उभयपदी) - जिसका अर्थ है जोड़ना या मिलाना।
  • युज् संयमने (चुरादि गण, परस्मैपदी) - जिसका अर्थ है संयम या नियंत्रण।

इस प्रकार, योग का अर्थ समाधि, जोड़ और संयम तीनों का समन्वय है। योग, आत्मिक प्रगति की वह विधा है जो व्यक्तित्व को पूर्णता की ओर ले जाती है।


आत्मिक प्रगति के दो मुख्य चरण होते हैं:

  • योग: भावनात्मक शुद्धि का मार्ग
  • तप: क्रियात्मक शुद्धि का मार्ग

योग सूक्ष्म चेतना को परिमार्जित करता है, जबकि तप स्थूल शरीर को परिष्कृत करता है। मानव का अस्तित्व चैतन्य आत्मा (प्राण) और जड़ शरीर के मेल से बना है, अतः दोनों का ही परिमार्जन आवश्यक है। भावशुद्धि को योग और क्रियाशुद्धि को तप कहा जाता है। योग मार्ग का साधक, योग साधना द्वारा कुण्डलिनी शक्ति का जागरण करता है। कुण्डलिनी वह सुप्त शक्ति है, जो मूलाधार चक्र में स्थित रहती है। साधना के माध्यम से जब यह शक्ति जाग्रत होती है तो शरीर के विभिन्न चक्रों का भेदन करती हुई ऊपर उठती है और साधक को आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाती है। योग साधक को वेद का अध्ययन और संत के सत्संग का सहारा लेना चाहिए। क्योंकि यह पथ केवल शारीरिक नहीं, अपितु मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक प्रगति का मार्ग है।


 योग छः प्रकार होते हैं। 

1. राजयोग (अष्टांग योग)

महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित राजयोग को अष्टांग योग भी कहा जाता है। इसमें आठ अंगों — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि — के माध्यम से साधक मन को नियंत्रण में लाकर आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है। राजयोग का मुख्य उद्देश्य चित्तवृत्तियों का निरोध कर चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार करना है।


2. हठयोग

हठयोग एक प्राचीन योग पद्धति है, जिसमें "ह" का अर्थ सूर्य (पिंगला नाड़ी - सक्रियता) और "ठ" का अर्थ चंद्रमा (इड़ा नाड़ी - शांति) है। हठयोग का उद्देश्य इन दोनों ऊर्जाओं का संतुलन साधना है। इसमें आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा और ध्यान का विशेष महत्व है। यह शरीर, मन और आत्मा के सामंजस्य का मार्ग है।


3. लययोग

"लय" का अर्थ है विलय और "योग" का अर्थ है एकता। लययोग में साधक अपने मन और चेतना को परमात्मा में विलीन करने का प्रयास करता है। यह ध्यान और समाधि की उच्चतम अवस्थाओं को प्राप्त करने की पद्धति है।


4. ज्ञानयोग

ज्ञानयोग मुक्ति का मार्ग है, जो वेदांत दर्शन पर आधारित है। इसमें आत्मा (आत्मन) और परमात्मा (ब्रह्म) की एकता को बौद्धिक तथा ध्यानात्मक ज्ञान के माध्यम से समझा जाता है। इसका साधक विवेक, वैराग्य और आत्मचिन्तन के द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है।


5. कर्मयोग

कर्मयोग भगवद्गीता में वर्णित है, जो निष्काम कर्म पर आधारित है। इसमें साधक बिना फल की आकांक्षा के अपना कर्तव्य निभाता है। इसका मुख्य उद्देश्य है कर्म करते हुए भी अपने भीतर परमात्मा के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण बनाए रखना।


6. भक्तियोग

भक्तियोग प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मार्ग है। इसमें साधक अपने ईष्ट देवता के प्रति भक्ति भाव से स्वयं को अर्पित करता है। यह भावनाओं को परिष्कृत कर दिव्य प्रेम में परिवर्तित करने का पथ है।


 योग का अर्थ  

वैदिक संहिताओं में योग का तात्पर्य मन, वचन और कर्म द्वारा परमात्मा में एकाग्र हो जाने से है। संसार के संयोग-वियोग से रहित होकर, चिर स्थायी सुख — जो केवल परमात्मा में है — को प्राप्त करना ही योग है।

महर्षि पतंजलि ने योग को चित्त वृत्तियों के निरोध के रूप में परिभाषित किया है। तृष्णा, मोह, अहंकार आदि वृत्तियों का शमन कर चित्त को स्थिर करना योग है। यह साधना सांसारिक वासनाओं से ऊपर उठकर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का प्रयास है।


 योग साधना में शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएं 

योग साधना में विभिन्न शारीरिक और मानसिक अभ्यास अपनाए जाते हैं:

शारीरिक क्रियाएं:

आसन (शारीरिक मुद्राएं)
प्राणायाम (श्वास का नियंत्रण)
बंध (ऊर्जा नियंत्रण)
मुद्रा (विशेष हस्त-मुद्राएं)
शुद्धि क्रियाएं: नैति, धौती, बस्ति, न्यौली, कपालभाति आदि।
अन्य उपासनाएं: सदाचार का पालन, मौन व्रत, भूमिशयन, ताप सहनशीलता, कीर्तन आदि। इनका मुख्य उद्देश्य शरीर को स्वस्थ, समर्थ और पवित्र बनाना है ताकि वह साधना के योग्य बन सके।


मानसिक साधनाएं:

जप (मंत्रों का उच्चारण)
ध्यान (एकाग्रता साधना)
नाद (आंतरिक ध्वनि का अनुभव)
स्वाध्याय (आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन)
सत्संग (सज्जनों का संग)
इन साधनों से साधक की चेतना को दिशा, ऊर्जा और प्रकाश मिलता है।


 मेरुदण्ड : शरीर का आध्यात्मिक आधार  

मेरुदण्ड या रीढ़ मानव शरीर का एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। पारंपरिक भारतीय मान्यता के अनुसार मेरुदण्ड 33 अस्थि-खंडों (कशेरुकाओं) से संबंधित माना जाता है और इनमें तैंतीस देवताओं की शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान मानी गई हैं। इन तैंतीस देवताओं में आठ वसु, बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, इन्द्र और प्रजापति शामिल हैं। आठ वसुओं के नाम धरा, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभास बताए जाते हैं। बारह आदित्य हैं—विवस्वान, अर्यमन्, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, मित्र, वरुण, अंश, इन्द्र और विष्णु। ग्यारह रुद्रों के नाम विभिन्न ग्रंथों में अलग-अलग मिलते हैं; एक प्रसिद्ध सूची के अनुसार वे हैं—हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली। इनके अतिरिक्त इन्द्र और प्रजापति को मिलाकर कुल तैंतीस देवता माने जाते हैं। इस पारंपरिक दृष्टिकोण में मेरुदण्ड को केवल शरीर की अस्थि-रचना न मानकर विभिन्न दैवी शक्तियों के प्रतीकात्मक केंद्र के रूप में देखा गया है।

योगियों ने साधना की दृष्टि से इस शरीर को विश्व का प्रतीक जानकर दो भागों में विभक्त किया है - पिण्ड एवं ब्रह्माण्ड
योगी ध्यान में लीन – आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव।
पिण्ड (सूक्ष्म और स्थूल शरीर) पिण्ड शब्द का अर्थ है व्यक्तिगत शरीर या आत्म-स्तर का अस्तित्व, जिसे हम स्थूल शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण आदि के रूप में जानते हैं। ब्रह्माण्ड (बाह्य विराट चेतना) ब्रह्माण्ड वह विराट सत्ता है, जो समस्त सृष्टि को अपने भीतर समेटे हुए है — यह साकार और निराकार दोनों रूपों में विद्यमान है। योग का उद्देश्य पिण्ड (व्यक्तिगत चेतना) को ब्रह्माण्ड (सर्वव्यापक चेतना) से जोड़ना है।

इस दर्शन के अनुसार, जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वही लघुरूप में हमारे शरीर (पिण्ड) में भी विद्यमान है। बाहर नक्षत्र मंडल है, वैसे ही भीतर चक्र मंडल हैं। बाहर सूर्य-चंद्र हैं, तो भीतर इड़ा-पिंगला नाड़ियाँ हैं। बाहर ब्रह्माण्डीय ऊर्जा है, भीतर प्राणशक्ति है।

इसलिए, योगी साधना द्वारा अपने अंदर के पिण्ड को ब्रह्माण्ड के विराट स्वरूप से एकीकृत करने का प्रयास करते हैं। इसे ही "पिण्ड-ब्रह्माण्ड का मिलन" कहते हैं।


 चक्र, नाड़ियाँ और सहस्त्रदल कमल  

कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में रहती है। साधक जब योग साधना द्वारा इसे जागृत करता है, तो यह शक्ति क्रमशः सभी चक्रों को भेदती हुई सुषुम्ना मार्ग से सहस्त्रदल कमल तक पहुँचती है।

यह यात्रा माया के बंधनों को तोड़ती है और साधक को आत्मसाक्षात्कार तथा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कराती है। यह अवस्था मृत्यु के भय से मुक्ति और चिरन्तन आनन्द की प्राप्ति की अवस्था है।

मानव शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियां है। जिनमें तीन प्रमुख नाड़ी है 1. इड़ा 2. पिंगला 3. सुषुम्ना। ये नाड़ियां अपने मूल - स्थान से शरीर के विभिन्न जगह में गई है। जहां पर अनेक नाड़ियां एकत्र हो जाती हैं वहां पर एक चक्र- सा स्थान बन जाता है।

इस प्रकार शरीर में छः चक्र तथा सहस्त्रदल कमल है। चक्रों के नाम हैं- मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र तथा आज्ञा चक्र इस चक्र से परे है - सहस्त्रदल कमल। प्रथम पांच चक्र तो पिण्ड में अर्थात् शरीर में कण्ठ तक नीचे के हिस्से में अवस्थित हैं; किन्तु अन्तिम अर्थात् आज्ञा चक्र का आधा अंश पिण्ड में तथा आधा अंश ब्रह्माण्ड में है।

मूलाधार चक्र वासना और भौतिकता से जुड़ा है, स्वाधिष्ठान रचनात्मकता से, मणिपुर इच्छाशक्ति से, अनाहत प्रेम और करुणा से, विशुद्ध आत्म-अभिव्यक्ति से, और आज्ञा चक्र अंतर्दृष्टि तथा दिव्य दर्शन से सम्बंधित है। जब कुण्डलिनी इन सभी चक्रों को पार कर सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, तो साधक ब्रह्मज्ञान को साक्षात करता है।

ध्यान मुद्रा में बैठे साधक के शरीर में मूलाधार से सहस्रार तक सात ऊर्जा केंद्र।
साधकों ने इसकी कल्पना ही नहीं की है - अपतु इसका अभ्यास कर साक्षात् भी किया है। कुण्डलिनी जो विकृति रुपिणी प्रकृति तथा बन्धनरुपिणी माया का प्रतीक है, सामान्यतः सबसे निचले चक्र अर्थात् मूलाधार में अवस्थित रहा करती है।

फलत: हम सभी अपने शरीर के निचले हिस्से तथा उसमें केन्द्रित वासनाओं में लिप्त रहा करते हैं। यदि हमें साधना - पथ का पथिक होना है तो मूलाधार में सोयी हुई कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् करना होगा, जिससे वह सभी चक्रों का भेदन करती हुई अर्थात् प्रकृति और माया के आवरण जाल को काटती हुई मृत्युलोक से उठकर ब्रह्माण्ड स्थित आज्ञा चक्र में पहुंचे; और अभ्यासी उससे भी ऊपर ब्रह्रारन्ध में सहस्त्रदल कमल में विराजमान होकर ब्रह्म तथा उसकी ज्योति तथा अनवरत होनेवाले अनाहत नाद के साथ एकाकार अथवा तादात्म्य - भाव सम्पन्न कर सके।


योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह जीवन का सम्पूर्ण विज्ञान है। यह चित्त, शरीर और आत्मा को परिष्कृत कर परमात्मा से एकाकार करने का पथ है।योग से ही मानव अपनी भौतिक सीमाओं को पार कर ब्रह्माण्डीय चेतना से तादात्म्य स्थापित कर सकता है। योग वह साधना है जो व्यक्ति को आत्मिक पूर्णता, जीवन में स्थिरता और परम आनन्द की प्राप्ति कराती है।

योग की उत्पत्ति और विकास

योग भारतीय सभ्यता की एक प्राचीन आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपरा है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय साधना, ध्यान, तपस्या और आत्म-अनुशासन की परंपराओं में दिखाई देती हैं। योग का विकास किसी एक समय या एक व्यक्ति द्वारा नहीं हुआ, बल्कि कई शताब्दियों में विभिन्न वैदिक, उपनिषदिक, बौद्ध, जैन, सांख्य, वेदांत और हठयोग परंपराओं के माध्यम से हुआ। आज योग शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक साधना के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।


1. योग शब्द का अर्थ

"योग" शब्द संस्कृत की "युज्" धातु से बना माना जाता है। इसका सामान्य अर्थ जोड़ना, मिलाना, संयमित करना या एकाग्र करना है। अलग-अलग भारतीय दार्शनिक परंपराओं में योग की व्याख्या अलग-अलग रूपों में हुई है।

आध्यात्मिक संदर्भ में योग को आत्म-अनुशासन, ध्यान और आत्मज्ञान की साधना के रूप में समझा गया। इसलिए योग को केवल शारीरिक व्यायाम मानना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है।


2. प्राचीन भारत में योग की प्रारंभिक परंपरा

योग की उत्पत्ति का कोई एक निश्चित वर्ष बताना संभव नहीं है। प्राचीन वैदिक साहित्य में तप, ध्यान, संयम, प्राण और मन से संबंधित अनेक विचार मिलते हैं, जो बाद में विकसित होने वाली योग परंपराओं के लिए महत्वपूर्ण आधार बने।

भारतीय परंपरा में भगवान शिव को "आदि योगी" और "आदि गुरु" कहा जाता है। यह मुख्यतः शैव और योगिक परंपराओं से जुड़ी धार्मिक मान्यता है। इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना के बजाय भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा समझना उचित है।


3. सिंधु-सरस्वती सभ्यता और योग

सिंधु-सरस्वती या सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त कुछ मुहरों और मूर्तियों में ऐसी आकृतियाँ मिली हैं जिन्हें कुछ विद्वान योग या ध्यान जैसी मुद्राओं से जोड़ते हैं। प्रसिद्ध तथाकथित "पशुपति मुहर" इसका एक उदाहरण है।

हालाँकि इन पुरातात्विक आकृतियों को निश्चित रूप से योग का प्रमाण मानना विवादित है। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि इनमें ऐसी मुद्राओं के संकेत दिखाई देते हैं जिन्हें बाद की योग परंपराओं से जोड़ा गया है, लेकिन इनके आधार पर आधुनिक योग की सीधी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती।


4. वैदिक काल में योग के प्रारंभिक विचार

वेदों में आधुनिक अर्थ में व्यवस्थित आसन, प्राणायाम और अष्टांग योग का वर्णन नहीं मिलता। हालांकि वैदिक साहित्य में तप, ध्यान, प्राण, इन्द्रिय-संयम और आध्यात्मिक साधना से संबंधित विचार मिलते हैं।

इन्हीं प्रारंभिक आध्यात्मिक अवधारणाओं ने आगे चलकर भारतीय योग और ध्यान परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


5. उपनिषदों में योग

उपनिषदों के समय तक ध्यान, इन्द्रिय-संयम, मन और आत्मा से संबंधित विचार अधिक विकसित हो चुके थे।

कठोपनिषद में इन्द्रियों, मन और बुद्धि के नियंत्रण तथा आत्मज्ञान की साधना पर विशेष जोर दिया गया है। कठोपनिषद् 2.3.10–11 में इन्द्रियों और मन के स्थिर होने तथा बुद्धि के शांत होने की अवस्था को योग से जोड़ा गया है।

यहाँ योग का उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ रखना नहीं, बल्कि मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करके आत्मज्ञान और मुक्ति की ओर बढ़ना है।


6. भगवद्गीता में योग

भगवद्गीता ने योग की अवधारणा को अत्यंत व्यापक रूप दिया। इसमें योग केवल ध्यान या शारीरिक अभ्यास तक सीमित नहीं है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को विभिन्न प्रकार की योग-साधनाएँ बताते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—

  • कर्मयोग — कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन।
  • ज्ञानयोग — ज्ञान और विवेक के माध्यम से आत्मतत्त्व की खोज।
  • भक्तियोग — ईश्वर के प्रति भक्ति और समर्पण।
  • ध्यानयोग — मन को एकाग्र करके आत्मचिंतन।

इस प्रकार गीता में योग को जीवन जीने की एक समग्र आध्यात्मिक पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


7. महर्षि पतंजलि और योगसूत्र

योग के इतिहास में महर्षि पतंजलि का विशेष स्थान है। उनके योगसूत्र ने पहले से मौजूद अनेक योग और ध्यान परंपराओं को व्यवस्थित दार्शनिक रूप प्रदान किया।

पतंजलि ने योग को प्रसिद्ध सूत्र—

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"

के माध्यम से परिभाषित किया। इसका अर्थ है कि योग चित्त की वृत्तियों के निरोध या नियंत्रण की अवस्था है।

पतंजलि के योग में अष्टांग योग का वर्णन मिलता है—

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि

यहाँ आसन योग का केवल एक अंग है। इसलिए पतंजलि का योग आधुनिक समय में प्रचलित केवल शारीरिक आसनों से कहीं व्यापक है।


8. बौद्ध और जैन परंपराओं में योग

प्राचीन भारत की बौद्ध और जैन परंपराओं ने भी ध्यान, तपस्या, संयम और मानसिक अनुशासन को अत्यधिक महत्व दिया।

बौद्ध परंपरा में ध्यान, समाधि और मानसिक एकाग्रता मुक्ति के मार्ग के महत्वपूर्ण अंग बने। जैन धर्म में तप, ध्यान, संयम और आत्म-अनुशासन को आध्यात्मिक प्रगति से जोड़ा गया। इन परंपराओं ने भारतीय ध्यान और साधना की व्यापक परंपरा को समृद्ध किया।


9. मध्यकालीन योग और हठयोग

मध्यकाल में योग की अनेक नई परंपराएँ विकसित हुईं। इनमें नाथ परंपरा और हठयोग का विशेष महत्व है।

हठयोग में शरीर, श्वास और मन को साधने के लिए आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध और ध्यान जैसी साधनाओं पर जोर दिया गया।

स्वात्माराम द्वारा रचित हठयोग प्रदीपिका हठयोग की प्रसिद्ध ग्रंथ-परंपरा में शामिल है। इसके अतिरिक्त घेरण्ड संहिता और शिव संहिता भी हठयोग से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।


10. आधुनिक काल में योग का प्रसार

19वीं और 20वीं शताब्दी में योग ने भारत की सीमाओं से बाहर व्यापक रूप से लोकप्रियता प्राप्त की।

स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों में भारतीय दर्शन और योग की अवधारणाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में परमहंस योगानंद, स्वामी शिवानंद, श्री तिरुमलाई कृष्णमाचार्य, बी.के.एस. अयंगर तथा बाबा रामदेव जैसे योग प्रचारकों ने योग को जन-जन तक पहुँचाने में योगदान दिया।

आधुनिक समय में योग के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर भी विशेष ध्यान दिया जाने लगा।


11. आज का योग

आज योग दुनिया के अनेक देशों में अभ्यास किया जाता है। आधुनिक योग में आसन, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम जैसी तकनीकों का प्रयोग शारीरिक स्वास्थ्य, लचीलापन, एकाग्रता और मानसिक शांति के लिए किया जाता है।

हालाँकि आधुनिक स्वास्थ्य-केंद्रित योग और प्राचीन आध्यात्मिक योग के उद्देश्य कई मामलों में अलग हो सकते हैं, दोनों की ऐतिहासिक जड़ें भारतीय योग परंपरा से जुड़ी हैं।


12. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

योग की वैश्विक लोकप्रियता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसंबर 2014 को 21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया। पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया। हर वर्ष 21 जून को दुनिया के अनेक देशों में योग से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।


योग की उत्पत्ति को किसी एक व्यक्ति, एक वर्ष या एक ग्रंथ से जोड़ना उचित नहीं है। इसकी प्रारंभिक जड़ें प्राचीन भारतीय तप, ध्यान और आत्म-अनुशासन की परंपराओं में दिखाई देती हैं। वैदिक साहित्य, उपनिषदों और भगवद्गीता में इसके विचार विकसित हुए, पतंजलि के योगसूत्र में इन्हें व्यवस्थित दार्शनिक रूप मिला और मध्यकाल में हठयोग जैसी परंपराओं का विकास हुआ।

आधुनिक युग में योग भारत से निकलकर पूरी दुनिया में पहुँचा और आज यह शरीर, श्वास, मन और आत्म-अनुशासन से जुड़ी एक व्यापक परंपरा के रूप में जाना जाता है। इसलिए योग को केवल व्यायाम कहना इसके हजारों वर्षों के दार्शनिक और आध्यात्मिक इतिहास को बहुत सीमित कर देना होगा।

वेद और उपनिषदों में देवता

वैदिक परंपरा में तैंतीस देवताओं की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। इसका सबसे स्पष्ट दार्शनिक और व्याख्यात्मक विवरण बृहदारण्यक उपनिषद् 3.9 में मिलता है। ऋषि याज्ञवल्क्य से जब विदग्ध शाकल्य पूछते हैं कि वास्तव में कितने देवता हैं, तो याज्ञवल्क्य अंततः तैंतीस देवताओं का उल्लेख करते हैं। वे कहते हैं कि ये आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य हैं; इनके साथ इन्द्र और प्रजापति मिलकर कुल तैंतीस होते हैं।


1. आठ वसु

बृहदारण्यक उपनिषद् 3.9.3 में आठ वसुओं के व्यक्तिगत पौराणिक नाम देने के बजाय उनके स्वरूप बताए गए हैं। वे हैं—

अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य (सूर्य), द्युलोक/द्यौ, चन्द्रमा और नक्षत्र।

उपनिषद् के अनुसार इन्हें वसु इसलिए कहा गया है क्योंकि इनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित या निवास करता है।

अर्थात् उपनिषद् की मूल सूची में आठ वसु इस प्रकार हैं:

1. अग्नि
2. पृथ्वी
3. वायु
4. अन्तरिक्ष
5. आदित्य (सूर्य)
6. द्युलोक
7. चन्द्रमा
8. नक्षत्र

2. ग्यारह रुद्र

बृहदारण्यक उपनिषद् 3.9.4 में ग्यारह रुद्रों को किसी ग्यारह अलग-अलग देवताओं के नाम के रूप में नहीं बताया गया है। वहाँ मानव शरीर की दस इन्द्रियाँ और मन को ग्यारह रुद्र कहा गया है।

दस इन्द्रियाँ हैं—

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ:

1. ऑंख

2. कान

3. नाक

4. जिभ्या

5. त्वचा

पाँच कर्मेन्द्रियाँ: 
6. हाथ
7. पैर
8. मुंह
9. गुदा
10. लिंग

और—

11. मन

उपनिषद् इनको रुद्र इसलिए कहता है क्योंकि जब ये जीवन से अलग हो जाते हैं, तब संबंधी शोक करने लगते हैं अर्थात् रुदन करते हैं। इस प्रकार यहाँ "रुद्र" की व्याख्या मानव जीवन की इन्द्रिय एवं मानसिक शक्तियों के रूप में की गई है।


3. बारह आदित्य

बृहदारण्यक उपनिषद् 3.9.5 में बारह आदित्यों को वर्ष के बारह महीनों के रूप में समझाया गया है। उपनिषद् के अनुसार ये समय के साथ आगे बढ़ते हुए सबको अपने साथ ले जाते हैं, इसलिए इन्हें आदित्य कहा गया है।

इसलिए उपनिषद् के मूल संदर्भ में बारह आदित्यों को इस प्रकार समझना अधिक प्रमाणिक है—

1. चैत्र
2. वैशाख
3. ज्येष्ठ
4. आषाढ़
5. श्रावण
6. भाद्रपद
7. आश्विन
8. कार्तिक
9. मार्गशीर्ष
10. पौष
11. माघ
12. फाल्गुन

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि उपनिषद् स्वयं इन महीनों के संस्कृत नामों की सूची नहीं देता, बल्कि "वर्ष के बारह महीने" को बारह आदित्य कहता है।


4. इन्द्र और प्रजापति

तैंतीस की संख्या पूरी करने वाले अंतिम दो हैं—

32. इन्द्र
33. प्रजापति

बृहदारण्यक उपनिषद् 3.9.2 में इन दोनों को आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्यों के साथ मिलाकर तैंतीस की संख्या पूरी की गई है।

तैंतीस की पूरी संरचना

8 वसु + 11 रुद्र + 12 आदित्य + इन्द्र + प्रजापति = 33

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। "तैंतीस देवता" का अर्थ अनिवार्य रूप से 33 अलग-अलग मानव-जैसे देवताओं की सूची नहीं है। बृहदारण्यक उपनिषद् इन 33 को प्रकृति, ब्रह्मांडीय व्यवस्था, समय तथा मानव शरीर की शक्तियों से जोड़कर समझाता है। उसी संवाद में याज्ञवल्क्य आगे देवताओं की संख्या को 6, 3, 2, 1½ और अंततः 1 तक ले जाते हैं। इससे उपनिषद् का उद्देश्य केवल देवताओं की गिनती करना नहीं, बल्कि अनेक रूपों के पीछे एक मूल सत्य की ओर संकेत करना भी है।

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